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कश्यप मेवाड़: वह कारीगर जिनके हाथों सजा राम मंदिर का पवित्र भगवा ध्वज

राम मंदिर का काम धर्म ध्वज के साथ संपन्न.

राम मंदिर का काम धर्म ध्वज के साथ संपन्न.

भगवान राम मंदिर का उद्घाटन हो या शिखर पर ध्वजारोहण, ये पल सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक होते हैं. अगर आप हिंदू परंपरा में आस्था रखते हैं, इसके सुखद अहसास की कोई सीमा नहीं. इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनना किसी भी कलाकार या परंपरा के लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर फहराने वाली धर्म ध्वज तैयार करने की उपलब्धि को हासिल करने वाले हैं, राजस्थान के कश्यप मेवाड़. मेवाड़ परिवार पीढ़ियों से मंदिरों के ध्वज निर्माण की कला में पारंगत माना जाता है. उनकी बनाई ध्वज न सिर्फ आस्था का प्रतीक है बल्कि तकनीकी रूप से भी बेहद मजबूत, पवित्र और पारंपरिक नियमों के अनुसार तैयार की जाती है.

कौन हैं कश्यप मेवाड़?

कश्यप मेवाड़ राजस्थान के उदयपुर/मेवाड़ क्षेत्र के रहने वाले एक प्रसिद्ध धर्म ध्वज निर्माता हैं. इनके परिवार को ध्वज निर्माण में कई पीढ़ियों का अनुभव है, जिसे एक पवित्र सेवा (धार्मिक शिल्प) के रूप में देखा जाता है. कश्यप मेवाड़ देशभर के प्रमुख मंदिरों (विशेषकर वैष्णव, शैव और शक्ति उपासना केंद्रों) के लिए ध्वज तैयार करने के लिए जाने जाते हैं. इनके परिवार में ध्वज निर्माण करने से पहले विशेष नियमों, उपवास और पूजा का पालन करने की भी परंपरा है.

कश्यप मेवाड़ अभी तक नाथद्वारा मंदिर, महाकालेश्वर उज्जैन, खाटू श्यामजी, श्री रणछोड़ मंदिर में उनके ध्वज उपयोग किए जाते हैं. कश्यप मेवाड़ का परिवार शत-प्रतिशत पारंपरिक धार्मिक शिल्प से जुड़ा है. वे जिस कारीगरी को आगे ला रहे हैं, वह प्राचीन मंदिर-ध्वज निर्माण की परंपरा को आधुनिक युग में जीवित रखने का प्रयास है. उनकी मेहनत, सतर्कता और श्रद्धा ने एक ऐसा ध्वज तैयार किया है, जो न केवल भौतिक दृष्टि से मजबूत है, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी गौरव प्रदान करता है.

राम मंदिर की धर्म ध्वज बनाने का जिम्मा कैसे मिला?

राम मंदिर ट्रस्ट ने परंपरा, ऐतिहासिकता और धार्मिक शुद्धता को ध्यान में रखकर कश्यप मेवाड़ को चुना. कश्यप मेवाड़ मंदिरों के लिए सात्विक और शास्त्रीय विधि से ध्वज निर्माण करते हैं. उनकी बनाई ध्वज की खासियत यह है कि यह अभिजीत मुहूर्त या विशेष शुभ समय में तैयार की जाती है.उनकी ध्वज प्राकृतिक रंगों, पवित्र सूत धागों और पारंपरिक वैदिक नियमों से तैयार होती है.

धर्म ध्वज बनाने की प्रक्रिया क्या है? 

धर्म ध्वज का निर्माण मात्र कारीगरी नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है. ध्वज के लिए शुद्ध कपास या रेशम का चयन किया जाता है. ध्वज में उपयोग होने वाला रंग गरुड़ रंग, केतकी रंग, भगवा, पीत आदि शुभ रंगों में चुना जाता है. ध्वज बनाने से पहले सामग्री को गंगाजल या पवित्र जल से शुद्ध किया जाता है. कारीगर एक दिन पहले उपवास रखते हैं. पवित्र मंत्रोच्चार के साथ ध्वज को सिलते समय विष्णु या राम मंत्रों का उच्चारण किया जाता है.

प्रतीक निर्माण के रूप में ध्वज पर ॐ, सूर्य, धर्म चक्र, गरुड़, हनुमान, त्रिशूल जैसे चिन्ह हाथों से बनाए जाते हैं. कश्यप मेवाड़ की ध्वज में विशेष रूप से भगवान राम के चिन्ह उकेरे जाते हैं. ऊँचे शिखर पर तेज हवा में लंबे समय तक टिक सके, इसके लिए ध्वज को मजबूत स्टिचिंग और खास एंगल डिजाइन दी जाती है. ध्वज का आकार, लंबाई, चौड़ाई मंदिर वास्तु के मुताबिक तय किया जाता है.

कश्यप मेवाड़ की खासियत क्यों?

वे ध्वज निर्माण को केवल काम नहीं बल्कि सेवा मानते हैं. उनकी ध्वज वर्षों तक टिकती है और मंदिर की दिशा व वायु गति के अनुसार डिजाइन की जाती है. शास्त्रीय मानकों में उनकी पूर्ण पकड़ है. उनकी ध्वजा का रंग लंबे समय तक फीका नहीं पड़ता.

राम मंदिर की ध्वज में क्या खास है?

ध्वज विशेष रूप से अयोध्या की दिशा और शिखर के अनुसार तैयार की गई है. इसमें राम नाम, सूर्य, धनुष-बाण जैसे शुभ प्रतीक हैं. यह 100% पारंपरिक पद्धति से बनाई गई है. ध्वज का निर्माण शुभ मुहूर्त में किया गया है.


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Written by: Dhirendra Mishra

26 Nov 2025  ·  Published: 06:25 IST

मुंबई में कबूतरों को दाना डालना पड़ा महंगा, पहली बार दर्ज हुई FIR; हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस एक्शन

मुंबई में कबूतरों को खाना देना पड़ेगा महंगा (फाइल फोटो)

मुंबई में कबूतरों को खाना देना पड़ेगा महंगा (फाइल फोटो)

Mumbai Pigeon Feeding Case: मुंबई में पहली बार एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया. यहां माहिम इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ सिर्फ इसलिए एफआईआर दर्ज की गई क्योंकि उसने सड़क किनारे कबूतरों को दाना डाला था. यह देश का पहला ऐसा केस है जिसमें कबूतरों को दाना डालने पर किसी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गई है.

दरअसल, यह मामला माहिम के एलजी रोड का है. पुलिस को सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति अपनी कार से सड़क किनारे कबूतरों को दाना डाल रहा है. जब पुलिस मौके पर पहुंची तो आरोपी वहां से जा चुका था और उसकी कार की नंबर प्लेट भी स्पष्ट नहीं थी, जिससे उसकी पहचान नहीं हो सकी. इसके बावजूद माहिम पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 270 और 223 के तहत अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज कर लिया.

कबूतरों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
पुलिस की यह कार्रवाई बॉम्बे हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद की गई है. हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि सार्वजनिक और ऐतिहासिक स्थलों पर कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाई जाए. कोर्ट ने यहां तक कहा था कि अगर कोई व्यक्ति इस आदेश का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए.

कबूतरों की बीट से फैल रही बीमारी
इसकी वजह यह है कि मुंबई में कबूतरों की बढ़ती संख्या एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, कबूतरों की बीट (मल) से एलर्जी और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां फैल रही हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए बीएमसी और पुलिस ने मिलकर अब कबूतरखानों पर सख्त निगरानी का फैसला लिया है.

फिलहाल, दादर कबूतरखाना का निरीक्षण किया जा चुका है और वहां तीन शिफ्टों में निगरानी अधिकारी तैनात किए जा रहे हैं. मुंबई में कुल 51 कबूतरखानों की पहचान की गई है, जिन्हें अब नियमित रूप से मॉनिटर किया जाएगा. यह मामला भले ही मामूली लगे, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश छिपा है. सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे वह किसी भी परंपरा या धार्मिक आस्था से जुड़ा क्यों न  हो.


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Written by: Raihan

03 Aug 2025  ·  Published: 20:56 IST

'दिशोम गुरुजी' नहीं रहे; झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन

सीएम हेमंत सोरेन अपने पिता शिबू सोरेन के साथ (फाइल फोटो)

सीएम हेमंत सोरेन अपने पिता शिबू सोरेन के साथ (फाइल फोटो)

Jharkhand Ex Chief Shibu Soren Death: झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन का एक युग खत्म हो गया है. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का सोमवार (4 अगस्त) को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया. वह 81 साल के थे और पिछले एक महीने से अस्पताल में भर्ती थे. 

पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को किडनी संबंधी समस्या के चलते जून के अंतिम सप्ताह में अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनका लंबे समय से इलाज चल रहा था और वह वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे. शिबू सोरेन के निधन की जानकारी उनके बेटे और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर दी. 

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भावुक पोस्ट में लिखा, "आदरणीय दिशोम गुरुजी अब हमारे बीच नहीं रहे. आज खुद को बिल्कुल अकेला महसूस कर रहा हूं."

आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं।

आज मैं शून्य हो गया हूँ...

— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) August 4, 2025

38 साल से JMM का किया नेतृत्व 
शिबू सोरेन झारखंड के आदिवासी समाज के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे. वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के 38 सालों तक प्रमुख रहे और पार्टी के संस्थापक संरक्षक के रूप में भी पहचाने जाते हैं. झारखंड राज्य के गठन से पहले और बाद में उन्होंने आदिवासी अधिकारों की आवाज बुलंद की.

वह तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के तौर पर भी अपनी भूमिका निभाई. संसदीय राजनीति में भी उनका लम्बा अनुभव रहा. वह दुमका लोकसभा सीट से 1980 से 1984, फिर 1989 से 1998 और बाद में 2002 से 2019 तक सांसद रहे.

पीएम मोदी ने जताया दुख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिबू सोरेन के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए और उन्हें "जमीनी नेता" बताया. पीएम मोदी ने कहा, "श्री शिबू सोरेन जी एक जमीनी नेता थे जिन्होंने जनसेवा के क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से कार्य किया. वह विशेष रूप से आदिवासी समुदायों, गरीबों और वंचितों को सशक्त बनाने को लेकर समर्पित थे. उनके निधन से दुखी हूं. मैंने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी से बात कर शोक व्यक्त किया है. ओम शांति."

Shri Shibu Soren Ji was a grassroots leader who rose through the ranks of public life with unwavering dedication to the people. He was particularly passionate about empowering tribal communities, the poor and downtrodden. Pained by his passing away. My thoughts are with his…

— Narendra Modi (@narendramodi) August 4, 2025

झारखंड की आत्मा थे दिशोम गुरुजी
शिबू सोरेन को 'दिशोम गुरुजी' के नाम से जाना जाता था. उन्होंने जीवनभर आदिवासियों के हक, जमीन और पहचान के लिए संघर्ष किया. उनके निधन को झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक अपूर्णीय क्षति के रूप में देखा जा रहा है. देशभर से नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. उनके निधन से झारखंड ही नहीं, पूरे देश की राजनीति में एक गहरी खालीपन आ गया है जिसे भरना मुश्किल होगा.


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Written by: Raihan

04 Aug 2025  ·  Published: 05:36 IST

स्वतंत्रता दिवस पर देश देशभक्ति के रंग में डूबने के लिए तैयार

'हर घर तिरंगा'

15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस हर भारतीय के दिल के बेहद करीब होता है. इस दिन देशभर में झंडा फहराने, परेड देखने और देशभक्ति गीत गाने का खास उत्साह रहता है। हम 15 अगस्त के बेहद करीब हैं, देश अपने आजादी के नायकों को याद कर रहा है, उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। देश के प्रधानमंत्री कुछ ही घंटों में देश को संबोधित करने वाले हैं। देशवासी 'हर घर तिरंगा' के जरिए अपने घरों पर तिरंगा लागाकर आजादी का जश्न मना रहे हैं। 

क्या है 'हर घर तिरंगा' अभियान

हर घर तिरंगा' एक अभियान है जो आज़ादी का अमृत महोत्सव के तत्वावधान में लोगों को तिरंगा घर लाने और भारत की आज़ादी के प्रतीक के रूप में इसे फहराने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किया गया था। यह इस विचार से उपजा है कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ हमारा रिश्ता हमेशा व्यक्तिगत से ज़्यादा औपचारिक और संस्थागत रहा है। इस प्रकार, एक राष्ट्र के रूप में सामूहिक रूप से ध्वज को घर लाना न केवल तिरंगे के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव का प्रतीक बन गया, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का भी प्रतीक बन गया। इस पहल के पीछे का उद्देश्य लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाना और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। संस्कृति मंत्रालय, 'हर घर तिरंगा' के लिए नोडल मंत्रालय है।

तिरंगे का इतिहास

तिरंगा, भारत का राष्ट्रीय ध्वज, 22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था. यह तीन क्षैतिज पट्टियों से बना है: केसरिया, सफेद और हरा, जिसमें सफेद पट्टी के बीच में अशोक चक्र है. केसरिया रंग साहस और त्याग का प्रतीक है, सफेद रंग शांति और सत्य का, और हरा रंग विश्वास और समृद्धि का. अशोक चक्र 24 तीलियों वाला एक पहिया है, जो न्याय और प्रगति का प्रतीक है। आज हम उसी झंडे पर बात करेंगे भारत का झंडा जिसको हम सब प्यार से तिरंगा कह कर बुलाते हैं। आज हम जिसे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में देख रहे हैं, उसका यह स्वरूप कई परिवर्तनों के बाद आया। मैडम भीकाजी कामा, सिस्टर निवेदिता, एनी बेसेंट, लोकमान्य तिलक आदि ना जाने कितने लोगों ने इस कार्य में अपना योगदान दिया है। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज की पहली बार मांग की गई थी। इसी कड़ी में 31 दिसंबर 1929 को रावी नदी के तट पर भारत में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। इस ध्वज ने आजादी की लड़ाई में ना जाने कितने लोगोंको संगठित करने में  अहम भूमिका निभाई थी। किसी भी देश का संविधान, उसकी करेंसी, उसकी सेना, उसका झंडा यह कुछ चीजें होती हैं जो उस देश के लोगों को जोड़ती हैं और उस देश से बाहर की दुनिया में उस देश का विशेष प्रतीक होती हैं। भारतीय तिरंगे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इससे पूर्व भी अलग-अलग रूपों में लोगों ने इसको बनाया और फहराया था।

गांधी जी भी राष्ट्रीय आंदोलन में झंडे के महत्व को बखूबी समझते थे। वास्तव में दुनिया भर में जितने बड़े आंदोलन और क्रांतियां हुई हैं उन सब में किसी न किसी झंडे का इस्तेमाल
अवश्य किया गया है। एक सैनिक नाम नमक निशान के लिए अपने प्राणों की आहुति दे देता है। हम इससे ही झंडे के महत्व को समझ सकते हैं। हम सभी को अपने घर सम्मान सहित तिरंगे को फहराना है और अमर शहीदों को याद करना है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण को न्योछावर किया। आजादी के 79वें दिवस पर आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं।


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Written by: Rajeev

14 Aug 2025  ·  Published: 13:20 IST